मा की कब्र और मेरा घर

सीने से लगा ले माँ,
उठ, और मुस्कुरा दे देख मुझे
आज मैं तेरे पास आया हूँ…
तो क्या हुआ
जो बदन पर कपड़े नहीं हैं,
और पैरों पर छाले हैं?
तो क्या हुआ
जो थोडी सी चोट लगी है, और
माथे पर थोडा खून है?
तो क्या हुआ
जो कुछ खाया नहीं है
और गला सूखा पड़ा है?
जंग से पहली जो बस चली
उसी में सवार,
अपने घर अया हूँ माँ…
उठ माँ,
देख मैं अब भी अमीर हूँ…
मेरा घर मुझसे मत छीन|

 

The Portrait Of A Woman

 

Who touches her,
she who’s so sublimely
standing with her saree
draped modestly around her?

Who dares anchor vision
but into her eyes
that look far into nothingness
trying to find home?

Who clears his throat
that goes dry with the thought
of colouring her
white saree red?

Who does not see
the woman in her
and realise the human in him
and keep his nails trimmed?

Who wishes to tear
the canvas on which
I have lovingly painted
the portrait of a woman?

Gazing Oceans

 

Bare-feet
on naked, cold floor,
walking slowly
on a winter night
through empty rooms…

mild fog escaping
through
my parted lips
among heavy,
slow breathing…

silence surrounds me
and so
does dread
in the companionship
of darkness.

And if I can find
solace
in the image
of the moon
in my eyes,

I should,
probably,
step out and gaze
at the vastness
of oceans.

कोई ढूंडो मेरी माँ को



खो गयी है मेरी माँ…
वो प्लास्टिक के ब्रश से
रगड़कर चमकाये हुये
मेरे जूतों में कहीं.

खो गयी है मेरी माँ…
कंधों में घुसते
कोट को चीरते
उस भारी बस्ते में कहीं.

खो गयी है मेरी माँ…
मोबाइल पर टक टक करते
मेरे अंगूठों से लिखे
संदेशों में कहीं.

खो गयी है मेरी माँ…
कयी मिन्नतें करके
वो बॉस से ना मिली
एक छुट्टी में कहीं.

खो गयी है मेरी माँ…
बरसों से इकट्ठी करी
मेरी यादों में कहीं.
कोई ढूंडो मेरी माँ को.

माँ की वो फटी शॉल



एक शॉल थी माँ की,
कभी उससे माँ अपना सर
कभी कान और कभी
कंधे ढका करती थी.

एक शॉल थी माँ की,
जब रात को हम भाई
घर आते थे, तो माँ
उसी में सुला देती थी.

एक शॉल थी माँ की,
जो उसे बहुत ही कॅम
सिर्फ दिन के वक़्त ही
नसीब हुआ करती थी.

एक शॉल थी माँ की,
जो अभी भी है- माँ नहीं.
पर वो आज भी, फटी ही सही
सर्दियों में दिल जला देती है.

कभी सोते देखा है माँ को अपनी?



वो एक एक साँस
जो तुम्हारी खुशी पर चल रही है…

वो एक एक पल, आँखों का
जो यही सोचकर बंद हैं
की तुम्हारे सपने सोते हुये ही सही,
पर सुबह के बाद भी
टूटेंगे नहीं…

वो एक एक करवट
जो इसी बात से सेहमत है
की तुम्हारा शरीर
पूरे दिन के बाद
अब आराम कर रहा है…

वो एक एक याद
जो माँ भुलाती गयी
इसी खुशी में
की जब वो सोई नहीं, रातभर
toh अगले दिन तुम दुरुस्त उठे…

कभी सोते देखा है माँ को अपनी?

शायद ना देखा हो..
की वो तुमसे पेहले सो गयी
तो उसे नींद कैसे आयेगी?

आंखरी सांस की चिट्ठी



एक चिट्ठी थी.
बर्सों पेहले आई थी,
और कपड़ों के बक्से में
न जाने कहाँ खो गयी…

ऊपर पता मेरा ही था
पर कहीं रखकर
बाद में पढूंगा सोचकर,
अप्ने ही घर कहीं गुमा दी…

कल, अपने पुराने पर्चों
को जब छाँट रहा था
तो लोगों के क़र्ज़ हाथ लगे,
और हाथ लगी वो चिट्ठी.

ऊपर पता माँ का लिखा था,
बीच का तो अब याद नहीं
पर, ‘आशा करती हूँ ठीक हो…’
और विराम की जगह् एक लाल बूंद थी.

 

शाम की चाय


आज ऑफीस से आई थी,
थक्की हुई, शाम को,
थोड़ी ठंड में काँपती
भारी सांस के साथ…

अब ज़्यादा साल नहीं रेह गये
रिटाइयर्मेंट को,
पर उम्र से, और शक्ल से
मुझसे जवान लगती है.

कैसे मुझे स्कूल तक
खुद छोड्ने आती थी,
फिर बस्ता संभालते हुये,
मैं खुद को संभालने लगा.

इन खयालों में भूल ही गया
की कैसे आज मया आई,
ऑफीस से, और आते ही पूछा,
“चाय पीयोगे, बना दूँ?”

Oh, You Wise Mother!

 

I always questioned
that mother
who sent her child,
her only child
in the battlefield.

She had held
his hands
since his birth
and made him
see the world.

He had hugged her
whenever
he picked himself
up from a fall,
crying, profusely.

They had cried
and laughed
together
for upwards
of two decades.

How could she
send her child,
although
reluctantly,
then, to die?

It was probably,
I realised,
for his smile
when he came back
with his duty done.

Sometimes, Life Comes To Me

She came to me
in vibrant colours
and splashed some
all over me.

She came to me
but all cheerful
and sprinkled me
with her cheers.

She came to me
running- young-
and took away
a few time off me.

Oh! Life…
don’t you know how
I cannot disappoint
that which is grief?